शुक्रवार

कोसी क्षेत्र की ऐतिहासिक धरोहरों का शोधात्मक अध्ययन

कोसी क्षेत्र की ऐतिहासिक धरोहरों का शोधात्मक अध्ययन

ईसा के 623 वर्ष पूर्व बुद्ध का अर्विभाव हुआ था। महापंडित रहुल सांकृत्यायन की ’बुद्धचर्या’ के अनुसार जब बुद्ध इस क्षेत्र मे अपने बारह सौ भिुक्षुओं के साथ पघारे थे, उस समय उनकी आयु 49 वर्ष की थी। तत्कालीन अंगुत्तराप के ’आपण निगम’ (वर्तमान बनगांव, महिषि) के ब्रहमण अपने विद्याानुराग और चातुर्य में अग्रगण्य थे उन्होंने गौतमबुद्ध जैसे ब्राह्मण धर्म विरोघी को अपने भिक्षु संध के सांस्थिक विधान में परिर्वतन संशोधन करने पर विवश किया था। इसकी वृहत चर्चा बौद्ध ग्रंथ ’सुत्त निपात के ’सेल सुत्तंम’ और महा वग्ग’ की ’केणिय कथा’ मे आयी है। इसी निगम के उद्भट विद्वान तीन वेद, निधंटु, कल्प इतिहास, व्याकरण लोकायत शास्त्र, दर्शन शास्त्र आदि में निष्णात तथा तीन सौ छात्रों को विद्यादान देने बाल सेल (शैल) नामक ब्राहमण ने बौद्ध धर्म की प्रवज्या ग्रहण कर ली और उसने संपूर्ण अंगुत्तराप(कोसी अंचल) में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार किया।
बौद्धों के अंतिम आश्रयदाता पाल राजाओं के अनेक स्मृति चिन्ह यहाँ बिखरे पड़े है। महाभारत कालीन अवशेष अध्ययन की दृष्टि से बड़े ही महत्वपूर्ण हैं । विराटनगर (नेपाल) के निकट भारतीय सीमा में स्थित ’भेड़याही’ गांव जिला अररिया से लेकर सहरसा जिले के विराटपुर तक राजा विराट के स्मृति चिन्ह मिल जाते हैं। इसके अतिरिक्त मुस्लिम शासकों के स्मृति चिन्ह भी मेरे अध्ययन की परिधि मे रहे हैं।
मैंने सभी स्थानों का परिभ्रमण कर इनका ऐतिहासिक सर्वेक्षण किया है।
सिंहेश्वर स्थान - यह मधेपुरा से आठ किलोमीटर उत्तर में समपूर्ण कोसी अंचल का महान शैव तीर्थ है। यहाँ का शिवलिंग अत्यंत प्रचीन है। वराहपुराण के उत्तर्राद्ध की एक कथा के अनुसार विष्णु ने इस शिवलिंग की स्थापना की थी। सिंहेश्वर के निकट ही कोसी तट पर सतोखर गांव है , जहाँ ऋष्यशृंग ने ‘द्वादश वर्षीय यज्ञ’ किया था जिसमें गुरुपत्नी अरुनधती के साथ राम की तीन माताएं आई थीं। इस यज्ञ का उल्लेख भवभूति ने ‘उत्त्तर रामचरित’ के प्रथमांक में किया है। इस यज्ञ के सारे साक्ष्य कोसी तीर पर सात कुंडों के रूप में मौजूद हैं । दो कुण्ड कोसी के पेट में समा गये हैं। खुदाई में राख के मोटी परत प्राप्त हुई है जो दीर्धकाल तक होने वाले यज्ञ के साक्ष्य हैं।
सिंधेश्वर स्थान में तीन आर्योत्तर जातियाँ - कुशाण, किरात और निषादों की संस्कृति का पुरा काल में ही विकास हुआ और यह शैव तीर्थ आदि काल से ही उन्हीं के द्वारा पुजित, संरक्षित एवं संरक्षित होता रहा।
कन्दहा का सूर्य मन्दिर- यह इस क्षेत्र का एकमात्र सूर्य मन्दिर है। यहाँ धेमुरा (धर्ममूला) नदी एक बड़े चैड़़े से आकार कन्दाहा और ‘देवनगोपाल’ गाँव के मध्य होकर बहती है । कहा जाता है कि यहाँ भगवान शिव ने विवेक, बुद्धि तथा अदम्य संकल्प शक्ति का प्रतीक अपने तृतीय नयन से कामदेव का दहन किया था जिसमें सूर्य का तेज था। कन्दाहा में द्वादशादित्यों में प्रसिद्ध ‘भवादित्य’ का प्राचीन सूर्य मन्दिर है। यह कन्दर्प दहन का साक्षी भी है तथा अंग देश के निर्माण का श्रेय भी इसी स्थल को है। कन्दाहा के चारों ओर अनेक शिव मंदिर हैं जिसमें देवनवन महादेव अति विख्यात हैं । इस शिवलिंग को महाभारत के पश्चात वाणासुर ने स्थापित किया था। इसके अतिरिक्त चैनपुर में नीलकंठ महादेव, बनगाँव में भव्य शिव मंदिर महिषी के निकट नकुचेश्वर महादेव तथा मुख्य कोसी के पश्चिम कुश ऋषि द्वारा स्थापित कुशेश्वरनाथ का भव्य मंदिर महतवपूर्ण है ।

महिषी - धेमुड़ा और त्रियुगा नदी के मध्य अवस्थित महिषी पौराणिक ही नहीं एक ऐतिहासिक स्थल भी है। यह आरम्भ में शिव की लीला - भूमि रही है। वृहत् धर्मपुराण और कालिका पुराण के अनुसार दक्ष प्रजापति के रौद्र रुप के विध्वंस के बाद सती की दग्ध देह को अपने कन्धे पर लेकर भगवान शिव चारों ओर धूमने लगे। शिव के रौद्र रुप को देखकर महाविनाश की आशंका से विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शव को 51 भागों मे काट कर गिरा दिया , कहा जसतस है कि इस स्थान पर सती के नेत्र का तारा गिरने से यह उग्रतारापीठ कहलाया।
स्मरण रहे कि महिषी का उग्रतारा स्थान, धर्मधारा(धमाहरा धाट) का कत्यायनी स्थान और विराटपुर का चण्डी स्थान त्रिकोण पर स्थित है जो तंत्र -साधना के लिए प्रशस्त क्षेत्र माना गया है। अतः बौद्ध धर्म के उद्भव के पूर्व महिषी हिन्दू धर्म का एक सिद्ध पीठ रही रही है ।
गुप्त शासन काल से पाल शासन काल तक कितने राजनैतिक उथल-पुथल और परिवर्तन हुए किन्तु महिषी के आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन पर इसका कोई प्रीााव नहीं पड़ा । महिषी तंत्र साधना का प्रमुख केन्द्र बनी रही । यह तंत्र तिब्बत और चीन से आयातित होकर भारत पहुँचा था। ‘चीनाचारतंत्र’ नामक ग्रन्थ में महिषी का वृतान्त है।
महिषी महायानियों का गढ़ था। यह पिछले हजार वर्षों से तांत्रिक साधना का केन्द्र रहा है । शंकराचार्य और मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ की कथा भी इस स्थान से जुड़ी है।

सरसंडी - उदाकिशुनगंज अनुमंडल के सरसंडी ग्राम में अकबर के काल की एक विशाल मस्जिद मिट्टी के नीचे दबी हुई है। कहा जाता है कि यह गन्धवरिया राजा बैरीसाल का किला था। इसका क्षेत्रफल 400 वर्गफीट है। सम्प्रति मस्जिद का स्थान ईदगाह में बदल गया है। इस ईदगाह से एक-डेढ़ किलोमीटर उत्तर मिट्टी का एक विशाल टीला है जिसका क्षेत्रफल 120 वर्गफीट तथा उँचाई 12 फीट। कहा जाता है कि राजा बैरीसाल का खजाना इसी मिट्टी के टीले में गड़ा हुआ है । सरसंडी से जुड़े सूफी फकीरों के कई
किस्से चर्चित हैं।
विराटपुर चण्डीस्थानः- सोनवर्षा प्रखण्ड स्थित इस गाँव में माँ चण्डी कर भव्य मंदिर है । इस मंदिर का वृतांत महाभारत से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि यह मंदिर राजा विराट के राजमहल के मुख्य द्वार पर था अथवा राजप्रसाद का मुख्य प्रसाद था, एक प्रस्तर स्तम्भ मंदिर के बाहर पड़ा हुआ है। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि इस मंदिर का ग्यारहवीं सदी में राजा कुमदानन्द चन्द्र द्वारापुनर्निमाण कराया गया है। इस मंदिर में बौद्ध युगीन दो प्रतिमाएँ भी है। लोक मान्यता के अनुसार वनवास काल में कुन्ती अपने पाँच पाण्डव पुत्रों के साथ यहाँ निवास करती थी।

श्रीनगर-कुशानों से रुपान्तरित राजभरों के शासक श्रीदेव के दो विशाल गढ़ के अवशेष इस गाँव में हैं विस्तृत भूखण्ड में फैले इन अवशेषों की ऊँचाई लगभग पन्द्रह फीट है । इसके नीचे लाखौरी ईंट की दीवारें हैं । पुरातत्व विभाग द्वारा इसका उत्खनन होने पर बहुमुल्य सामग्रियाँ मिलने की संभावना है

निशिहरपुर - मधेपुरा से बारह किलोमीटर पूर्वोत्तर कोण में किरात (बाँतर) राजा निशिहर देव की राजधानी , जहाँ एक ऊँचे टीले पर उनके गढ के अवशेष हैं, गढ पर पड़े उनके स्तंम्भ पूर्व पाल युग के प्रतीत होते हैं।

पंचरासी - मधेपुरा से साठ किलोमीटर दक्षिण पूर्व कोण पर चैसा प्रखंड में दैवी गाुणों एवं चमत्कारों से समलंकृत लोकदेव बाबा विशुराउत का सिद्ध स्थल है जो भक्तों एवं श्रद्धालुओं का आकर्षण केन्द्र हैं ।

बेलो गढ़- यह मधेपुरा से दस किलोमीटर पूर्व दक्षिण कोण पर अवस्थित है, यह महायानियों का प्रसिद्ध सिद्ध स्थल रहा है, यहाँ लोकेश्वरी देवी के स्थान पर प्रचीन ईंटों के प्राचीर के अवशेष मिले हैं जो संभवतः पाल युग के हैं । लोकेश्वरी महायानियों की देवी हैं ।

खौपैती - मधेपूरा से 7 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम स्थित एक गाँव है , यहाँ प्रसिद्ध बाहुबली लोरिक का युद्ध स्थल था- जियके स्मारक के रुप में मिट्टी का एक उंचा टीला अभी भी वर्तमान है।

गोलमा- मधेपुरा से 12 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम स्थित हैजहाँ 17 वीं शताब्दी में लोकदेव धोधन महाराज और 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में शिवदत्त का जन्म हुआ था।
मुरहो - मधेपुरा से 10 किलोमीटर पूरब-दक्षिण पर स्थित चर्चित गाँव। यहाँ पौराणिक आस्था एवं बौद्धकालीन सिद्धों का स्थल रहा है। मुरहो गाँव के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी रास बिहारी लाल मण्डल, कमलेश्वरी प्रसाद मण्डल, भुवनेश्वरी प्रसाद मण्डल एवं विन्ध्येश्वरी प्रसाद मण्डल थे।

रानीपट्टी- मधेपुरा से 30 किलोमीटर उत्तर-पूर्व स्थित यह गाँव स्वतंत्रता संग्राम का महत्वपूर्ण केन्द्र था। यहाँ 18 अप्रैल 1891 को सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी शिवनन्दन प्र. मण्डल तथा 1 फरवरी 1904 को महान समाजवादी नेता भूपेन्द्र नारायण मण्डल का जन्म हुआ।

शाह आलमनगर - यह मधेपुरा से साठ किलोमीटर दक्षिण चन्दैल शासको की राजधानी थी । इनके द्वारा निर्मित दुर्ग, तालाब, मंदिर आदि दर्शनीय है।
कोसी क्षेत्र में अनेक ऐतिहासिक महत्व के स्थल विखड़े पड़े हैं जिनका अध्ययन अनिवार्य है इन स्थलों में प्रमुख हैं- नयानगर (उदाकिशुनगंज), हरदीगढ (लोकदेव लोरिक से संबन्धित)़, श्रीपुर मिल्की तथा इस क्षेत्र मे फैले सूफी फकीरां के खानकाह आदि प्रमुख हैं।


संदर्भ सूचीः-

1. सहरसा जिला गजेटियर 1965
2. भागलपुर जिला गजेटियर, 1962
3. बिहार लोक संस्कृति कोश (मिथिला खंड) डा. लक्ष्मी प्रसाद श्रीवास्तव
4. मिथिला तत्व विमर्श, लेखक परमेश्वर झा, तरौनी 1949
5. बिहार की नदियां- हवलदार त्रिपाठी, पटना- 1977
6. बाराह पुराण, राघव शास्त्री (संपादक) बम्बई- 1932
7. मंत्रदृष्टा ऋष्य शृंग, हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ नोयडा, उ.प्र. 2001

निजी अध्ययन, सर्वेक्षण, स्थानीय लोगों से विमर्श एवं कई अन्य साक्ष्यों को सामने रखकर तैयार किया गया आलेख।

टिप्पणियां:
बहुत अच्छा. बढ़िया जानकारी.

बिहार के गौरव के बारे में आगे और भी लिखना चाहिए,
 
Bahut umda kaam. meri badhaee swikaren.
Kosi kee bat chaltee rahnee chahiye bilkul kosi kee tarah...
 
Accha likha hai aapane...
 
Bahut acchi jankari mili aapke blog se....!!
 
बहुत शोधपूर्ण और उपयोगी जानकारी। ऐसे तथ्यों को प्रकाश में लाना जरूरी है।
 
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